चूहड़ सिद्ध का मज़ार
अलवर (रॉयल पत्रिका)। ख्वाजा अब्दुर्हमान उर्फ चुहुड़सिद्ध का जन्म अट्ठारहवीं शदी के अंतिम बर्षों में चौ॰ सुजा मेव व माँ अमीरी के घर ,तत्कालीन रियासत अलवर की तहसील रामगढ़ के गाँव धनेटा में हुआ था। पिता एक छोटे जमींदार थे जो खेती और पशु पालन से किसी तरह अपना गुजर-बसर कर रहे थे। राजा की मालगुजारी देकर जो कुछ बचता उसी से अपना और बच्चों का जैसे-तैसे गुजारा कर लेते। दुर्भाग्य से एक साल वर्षा कम हूई तो फसल भी अचछी नहीं हुई। परिणामस्वरूप अनाज,भूसा और घर का सामान बिक गया मगर मालगुजारी फिरभी पूरी नहीं हुई। इस पर राजा के कर्मचारी उन्हें गिरफ्तार करके ले गये और जेल में डाल दिया। इस घटना से बालक अब्दुर्हमान इतना डर गया कि अपनी गिरफ्तारी के डर से ,सौंठ-खरैंटा अपने मामा के पास चले गये। मामा ने उन्हें बड़े प्यार से रखा और खेतों की रखवाली उनके जिम्मे करदी। मगर बालक अब्दुर्हमान खेत पर जाकर खेल-कूद में मस्त हो जाता और पक्षी ज्वार भुट्टोंसे दाने चुगते रहते। मामी जब ज्वार काटने आई तो देखा भुट्टे तो खाली हैं। तो उसने अब्दुर्हमान को गुस्से में बुरा-भला कहना शुरू कर दिया। अब्दुर्हमान इससे भयभीत हो गया कि कहीं मामा कड़ी सजा न देने लगे। वह डरकर भाग खड़ा हुआ और गाँम साहौड़ी,परगना अलवर पहुँच गया। यहाँ एक विधवा गूजरी ,जिसके कोई बच्चा नहीं था और इसी चिंता में बीमार रहने लगी थी, ने बालक को खुदा (प्रभु) का वरदान समझ अपने पास रख लिया। यहाँ बालक अब्दुर्हमान पहाड़ में गूजरी की गाय चराने लगा। यहीं से उनके जीवन में कुछ ऐसी घटनाएँ घटी कि उनक मन सांसारिक चीजों से विरक्त हो गया और वे रब की वहदानियत में रम गये।एक वह पहाड़ में गाय चरा रहा था कि एक फकीर आया और उससे कुछ खाने को मांगा। अब्दुर्हमान ने एक गाय का दूध निकाला और फकीर को पेश कर दिया। फकीर ने दूध पिया और खुश होकर बालक को आशीर्वाद दिया। कहते हैं फकीर वहाँ कई दिन टहरा और बालक अब्दुर्हमा को रब की वहदानियत की शिक्षा देता रहा। एक दिन फकीर ने अब्दुर्हमान से एक बड़े पत्थर की ओर इशारा करते हुए कहा,”इसे उठाओ।” अब्दुर्हमान ने पत्थर उठाया तो देखा उसके नीचे हीरे-जवारात का एक विशाल भण्डार है। फकीर ने कहा,”जितना चाहो ले लो।” मगर अब्दुर्हमान ने इंकार करते हुए कहक,”मैं इसका क्या करूँगा ।” इस पर फकीर ने उसे आशीर्वाद दिया और वहाँ से चला गया। लोगों का मत है कि वह फकीर कोई और नहीं,स्वयं शाह मदार थे ही थे। इसकीपुष्टि इससे भी होती है कि फकीर के जाने के बाद अब्दुर्मान पर रब की वहदानियत तारी हो गई। वह गूजरी के घर गया। गायों को बांधा और गूजरी को लाठी और सर का कपड़ा सौंपते हुए कहा;
“ये ले अपनी लाठी-लूगड़ी,ये ले अपणी गाय।
हमपे मेहर मदार की,हम कसकी घेरां गाय।।”
इसके बाद वह पहाड़ में आया और जगह जहाँ अब उसका घर है,अल्लाह (प्रभु) की इबादत में तल्लीन हो गया और चिल्लाकशी शुरू करदी। जिस स्थान पर अब्दुर्हमान ने.चिल्लाकशी शुरू की उसके पास ही एक जोगी रहता था जो एक सिद्धस्त जादूगर था। उसकी हरकतों से आस- पास के गाँवों में रहने वाले लोग बहुत परेशान थे। अपने पास एक अजनबी की उस्थिति उसे पसंद नहीं थी।अत: जोगी ने उसे तरह-तरह परेशान करना शुरू कर दिया ताकि वह भाग जाए। सांप,बिच्छू,शेर सब भेजे मगर दर्वेश अब्दुर्हमा न पर इनका कुछ असर नहीं हुआ। यह देख जोगी डर गया और वहाँ से भाग खड़ा हुआ। यह देख आस-पास रहने वाले लोग बहुत खुश हुए और उन्हें पहले सिद्ध पुरुष और फिर चुहुड़ सिद्ध (अल्लाह का कामिल बंदा) कहने लगे। धीरे-धीरे उनकी प्रसिद्धी पूरी उत्तरी भारत में फैल गई और लोग दूर-दूर से उनसे आशीरवाद लेने आने लगे। मेजर पाउलेट लिखते हैं कि सन् 1875 में एक आश्चर्यजनक घटना घटी। रात में बारिस हुई और उस कुंड में पानी भरने लगा जो सूख चुका था। हिन्दुओं ने इसे उपगंगा कहा जबकि मेवों ने इसे बाबा चुहुड़ सिद्ध की बरकत ( चमत्कार माना। (व॰आ॰)। पाउलेट आगे लिखता है कि रामगढ़ के तहसीलदार ने सूचना दी कि जब मैं वहाँ गया तो लगभग दस हजार आदमी वहाँ से बाहर आ रहे थे और लगभग इतने ही अंदर जा रहे थे। बाहर लगभग एक हजार बैलगाड़ियाँ खड़ी थी और हजारों ऊँट और घोड़ों से लोग आए हुए थे। अलवर,भरतपुर से ही नहीं गुड़गाँव,मथुरा और हाथरस तक से लोग आए हैं। पाउलेट आगे लिखता है कि यहाँ एक ठंडे पानी का झरना बह रहा है। लोग इसमें स्नान करते हैं। विशेषकर अंधे और चर्म रोगी और वे ठीक हो जाते हैं। सोमवार को यहाँ बकरे चढ़ाये जाते हैं। इन बकरों को इसी पानी में धोया जाता है। यहाँ तककि पानी खून से लाल हो जाता है। लोग इसी में नहाते हैं और मन्नत मांगते हैं। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय सूफी संत चुहुड़ सिद्ध की प्रसिद्ध किस स्तर तक फैली हुई थी।आज भी हजारों लोग चुहुड़ सिद्ध के अस्थान पर हाजरी लगाते हैं।
संदर्भ:-
1- तारीख-ए-मेव क्षत्रिय
2-तज़किरा सूफिया-ए-मेवात-पृ॰- 416- 18
3-मुरकंका-ए-अलवर-पृ॰~72-75
4-अलवर गजट-पृ॰-69
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