अल्लामा फ़ज़ले-हक़ खैराबादी
अंग्रेजों के खिलाफ फतवा देने वाले क्रांतिकारी
पुण्यतिथि पर विशेष….
(1797-1861) अल्लामा फज़ले हक खैराबादी प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 के क्रान्तिकारी, तर्कशास्त्री व उर्दू अरबी, फारसी के प्रसिद्ध शायर थे। उनका जन्म 7 अप्रैल 1797 ई. में उत्तर प्रदेश राज्य के सीतापुर जिले के खैराबाद में हुआ था। शिक्षा सम्पन्न होने के पश्चात वह खैराबाद में ही अध्यापन कार्य करने लगे और फिर 1816 ई. में उन्नीस वर्ष की आयु में ब्रिटिश सरकार में नौकरी कर ली। लेकिन एक ऐसा समय आया जब उन्होंने नौकरी नहीं करने का मन बना लिया और 1831 ई. में सरकारी नौकरी छोड़ दी। नौकरी छोड़ने के पश्चात वह दिल्ली के मुग़ल दरबार में कामकाज देखने लगे और शायरो की महफिलें से वाबस्ता होने लगे। 1857 के दौर में जब ईस्ट इंडिया कंपनी के ज़ुल्मो की हद हो गई तो हिन्दुस्तान के राजा-महाराजाओं व महारानियो तथा नवाबो व मौलवियों द्वारा अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने का प्रयास किया और ज़बरदस्त विद्रोह की योजना बनाई। जिसका नेतृत्व क्रांति के महानायक मुग़ल सम्राट बहादुर शाह जफर द्वारा किया गया और अल्लामा फज़ले हक खैराबादी ने अहम भूमिका निभाई। अल्लामा फज़ले हक खैराबादी द्वारा अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद का फतवा देकर मुस्लिम समुदाय को अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह में शामिल होने की अपील की। जिसका लाभ मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर व अन्य विद्रोही नेताओं को मिला। मौलाना द्वारा फतवा जारी करने के बाद से ही अंग्रेज़ो द्वारा उनकी तलाश शुरू हो गई। 1857 की क्रांति असफल हो जाने के बाद मौलाना बचते बचाते दिल्ली से खैराबाद तशरीफ ले आये। खैराबाद में अंग्रेजों को भनक लग गई और 30 जनवरी 1859 को उन्हें खैराबाद से गिरफ्तार कर लिया गया। खैराबाद से उन्हें लखनऊ सेंशन कोर्ट ले जाया गया और वहीं पर मुकदमा चलाया गया। इस मुकदमे की पैरवी उन्होंने खुद की। कोई वकील नियुक्त नहीं किया। मौलाना पर अग्रेंजों के खिलाफ जेहाद का फतवा जारी करने तथा लोगों को विद्रोह के लिए उकसाने के संगीन आरोप लगाये गये। मुकदमे की बहस के दौरान उन्होंने अपने जुर्म को कुबूल किया पर झूठ नहीं बोला और कहा- हॉ वह फतवा सही है, वह मेरा लिखा हुआ था और आज भी मैं अपने फतवे पर कायम हूं। आरोपो को कुबूल करने के पश्चात उन्हें काला पानी की सज़ा सुनाई गई और सारी जायदाद ज़ब्त करने का आदेश जारी किया गया। अंडमान निकोबार (सेलुलर जेल) में ही 20 अगस्त 1861 ई. में उनका इंतकाल हो गया। अल्लामा साहब ने अपनी शायरी को एक नया मिजाज़ बख्शा है। उन्होंने अपने कलामो में अहसास व जज़्बात का बेहद इज़हार किया है। अल्लामा का नाम ऊर्दू, फारसी व शायरी की तारीख में सुनहरे हुरूफो मे लिखा जायेगा क्योंकि उन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी ऊर्दू,फारसी भाषा के लिए खिदमते अंजाम दी। साथ ही मुल्क की आज़ादी की जद्दोजहद में ही मुल्क से वफ़ा करते हुए इस दुनिया को अलविदा कह गए।
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